श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य सदगुरू भगवान श्री श्रीधर स्वामी महाराज इन्होने दिया हुआ
शुभाशीष
doc फाइल उपलब्द कराने के लिये 'श्रीसद्गुरुचरणरज' इनका ShridharSahitya.com ऋणी है।

 

स्वास्थ्यवर्धक भाग्योदय हो।

गुरुभक्ति, मुक्ति, ऐश्वर्य हो।

विद्या, शक्ति हो। संपन्नता, अपार धर्मशीलता हो।

बालको, विश्व का सत्य रूप आनंद (खुशी) है। स्वतः सिद्ध स्वप्रकाशित अलौकिक खुशी को आत्मसात कर, निस्वार्थ होकर, विश्व जगत की उत्पत्ति हर्षोल्लास के लिए ही है। ममता, माया, संदेह निर्मित करने वाली है। इसीलिए उस को महत्व ना देते हुए आत्मशांति होना ही निवृत्ति का मार्ग है। तुम सब इस परमोच्च निवृत्ति मार्ग के अधिकारी हो। मनोनिग्रह, इंद्रियों पर विजय, सर्वसमत्व, विश्व बंधुत्व, विश्वप्रेम, शांत स्वभाव, मृदुमधुर व्यवहार, परोपकार के लिए उपासना कार्य, मनोभाव से गुरु सेवा, सरलता एवं सजगता से करना ही निवृत्ति मार्ग के लक्षण है।

ऐसे आदर्श जीवन जीने वाले मेरे भक्तों, तुम अच्छे शिष्य और जीवन्मुक्त ज्ञानी बनो।

भाग्यवानो, तुम सब पर परब्रह्म परमेश्वर की असीम कृपा होकर भक्ति, ज्ञान, वैराग्य से परिपूर्ण होकर, सद्गुण मंडित ऐसे दिव्य जीवन व्यतीत कर, अपने जीवन को कृतार्थ करो यही सब के लिए मेरा ह्रदय से आशीर्वाद है।

आत्मसुख, सर्व सुख हो।

अज्ञानता, उद्वेग नष्ट हो।

पाप-ताप, भ्रांति, क्रोध, द्वेष आदि नष्ट होकर लोग सुखी हो।

नीति न्याय से इस जीवन में कोई अभागा ना रहे।

इस भूमि पर सभी सुखी हो। किसी माया-मोह में ना फंसे।

नित्यानंद स्वरूप के हो। प्रकाशित हो।

श्रीधर स्वामी, सज्जनगढ़
चैत्र शुक्ल ७ शके १८८४